वरिष्ठ पत्रकार अजय बोकिल का सटीक विश्लेषण... लोअर मिडिल क्लास: न दिल का दर्द कह पाए न रो  पाए...

  • May 27,2020 12:37 pm

लोअर मिडिल क्लास: न दिल का दर्द कह पाए न रो पाए...

अजय बोकिल
  
कोरोना संकट में प्रवासी मजदूरों के हल्ले और मानवीय संवेदना के सवालों के बीच देश का एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है, जिसके बारे में ज्यादा कोई नहीं सोच रहा। न सरकार न समाज। कोरोना के बाद संभावित अनिष्ट की चिंता में घुल रहा  समाज का ये ‘निम्न मध्यम वर्ग’ ( लोअर मिडिल क्लास)  वो है, जो न ‘तीन में है न तेरा में।‘ कोरोना ने इस वर्ग को जो गहरा जख्म दिया है, उससे इस वर्ग के लोगों से कुछ न कहते बन रहा है और न रोते। सरकारों की चिंता भी वोट बैंक की ज्यादा है और मीडिया में भी इस वर्ग की चिंताअोंऔर मुश्किलों का अक्स कहीं दिखाई नहीं पड़ता। क्योंकि ये सरकार की निगाह में ‘गरीब’ भी नहीं है। निम्न मध्यम वर्ग के सामने आज की तारीख में सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि कोरोना के बाद की जिंदगी किन मुश्किलों में कटेगी, अपने सीमित संसाधनों से भावी चुनौतियों का किस तरह सामना करेंगे और यह भी ‍िक बेहतर और समृद्ध जिंदगी की आस में उन्होंने जो आर्थिक जोखिम उठाए, क्या वो सही थे? 

निम्न मध्यम वर्ग की एक दिक्कत और भी है कि उसे अक्सर मध्यम वर्ग ही समझ लिया जाता है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार ( वर्ष 2019 में) भारत में कुल आबादी का 28 फीसदी मध्यम वर्ग है। इसमें भी 14 फीसदी निम्न मध्यम वर्ग और 3 फीसदी उच्च मध्यम वर्ग है। अर्थात 5 करोड़ लोग ऐसे हैं, जिनकी मासिक आय 5 हजार रू. से लेकर 15 हजार ( इसे 20 हजार तक भी मान सकते हैं) के बीच है। ये सभी लोअर मिडिल क्लास में आते हैं। ये इनकम टैक्स नहीं देते, लेकिन बेहतर जीवन स्तर पाने के लिए जिंदगी भर खटते रहते हैं। इनकी आंकाक्षा मध्यीम वर्ग में फिट होने की तथा सपना उच्च मध्यम वर्गीय बनने का होता है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ( आईएमएफ) के वर्ल्ड इकाॅनामिक आउट लुक 2020 के अनुसार भारत में सालाना 90 हजार रू. से कम आय वाले परिवारों को गरीब कहा जाता है। जिनकी सालाना आय 90 हजार से 2 लाख के बीच है, वो निम्न मध्यम वर्गीय तथा 2 से 5 लाख वार्षिक आय वाले परिवार मध्यम वर्ग में आते हैं।

समाज में स्वतंत्र पहचान अथवा प्रभावशीलता की दृष्टि से यह वर्ग बहुत अहम और मुखर न हो, लेकिन समाज को सक्रिय रखने में उसकी बड़ी भूमिका है। क्योंकि यह वो वर्ग है जो सपनों के साथ जीता है और ‍िदन रात मेहनत भी करता है। साथ ही अपनी सीमाअों को लांघने की भरसक कोशिश करता रहता है। इनमें ज्यादातर या तो छोटी नौकरियां जैसे कि आॅफिस असिस्टेंट, डाटा एंट्री आॅपरेटर, रिसेप्शनिस्ट, काॅल सेंटर वर्कर, सेल्समैन या सेल्स गर्ल, निजी स्कूलों के शिक्षक, क्लर्क, ब्यू‍टीशियन, मशीन मैन, हेल्थ वर्कर का काम करने वाले आते हैं। इनकी बाहरी स्वरूप भले ही कुछ चमक-दमक वाला दिखा, भीतरी जिंदगी आर्थिक कशमकश से भरी होती है। लाॅक डाउन ने इनमें से ज्यादातर की नौ‍करियां या छोटे-मोटे कारोबार छीन लिए हैं। जिन संस्थानो में ये लोग काम करते हैं, उनमें से ज्यादातर ने छंटनी कर दी है, तनख्वाहें घटा दी हैं या ‍िफर जब हालत सुधरेगी तब काम पर आने को कह दिया है। इनमें से अधिकांश ने अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए भारी एजुकेशन लोन ले रखे हैं या फिर अपना मकान पाने की हसरत में होम ले रखे हैं। यानी जितनी आय है, खर्चे उससे कुछ ज्यादा ही हैं। बावजूद इसके  ये वो वर्ग है, जो सीमित आय के बाद भी बाजारवाद के हक में मजबूती से खड़ा रहता आया है। कई लोगों ने स्मार्ट फोन तक लोन लेकर खरीदे हैं, क्योंकि इन्हें सुविधा सम्पन्न जिंदगी जीनी है। वो पाना या कर दिखाना है, जो इनकी मामूली आय में संभव नहीं है। संक्षेप में कहें तो यह दांत खुरच कर पेट भरने वाला वर्ग है। 

लेकिन लाॅक डाउन ने इनकी जिंदगी की प्लानिंग ही तहस-नहस कर दी है। बहुतों की या तो नौकरियां जा चुकी हैं या फिर वेतन आधा हो चुका है। ऐसे में लोन की किस्तें कैसे चुकाएंगे? किस्ते भरेंगे तो परिवार का पेट किस तरह भरेंगे? मकान किराया कहां से देंगे?  ये हकीकत है कि  निम्न मध्यम वर्ग की गाड़ी अक्सर घर के सभी वयस्कों की थोड़ी-थोड़ी कमाई से मिलकर चलती है। यहां ‘एक और एक ग्यारह’ का सिद्धांत लागू होता है। लेकिन ‘एक’ की आय बंद होते ही मामला सिर्फ ‘एक’ पर आ टिकता है। और अब तो उसकी भी गारंटी नहीं है। 

निम्न मध्यम वर्ग की विडंबना ये है कि वो न उस तरह गरीब है, जिसे राजनेता ‘गरीब’ मानते हैं। न ही ये उस सम्पन्न तबके में हैं, जिसे राजनेता हर वक्त ‘झेलते’ हैं। दुर्भाग्य से ये समाज का वो वर्ग है, जो न भीख मांग सकता है और न ही प्रवासी मजदूरों की तरह पेट के लिए हजारों मील पैदल चल सकता है। वह सरेआम खाने के पैकेट छीन कर अपना पेट नहीं भर सकता। वह संगठित होकर अपनी आवाज भी बुलंद नहीं कर सकता। उसके पास जाॅब कार्ड भी नहीं है। उसे बीपीएल की तरह मुफ्तभ का राशन या मासिक नकदी भी नहीं मिलती। सरकारी पैकेजों में भी इस वर्ग को लोन पर ब्याज से राहत नहीं है। इन सब के बाद भी ये वर्ग फोर व्हीलर के विज्ञापन देखते हुए अपनी खटारा स्कूटर के पंक्चर सुधरवाते दिन काटता है। 

देश के इन 5 करोड़ ‘अधबीच’ लोगों की परेशानी यह है कि अगर आर्थिक हालात जल्द न सुधरे, गंवाई हुई नौकरियां वापस न मिलीं, बंद पड़े व्यवसाय फिर चालू न हुए और कर्ज वसूली के ‍लिए बैंकों के तगादे होते रहे तो जीएंगे कैसे? किसके भरोसे? और किस आश्वासन पर? ये बालकनी से दुनिया को देखने वाले वो बाशिंदे हैं जो सड़क पर ठेला भी नहीं लगा सकते? डर तो इस बात का है कि देश में गरीबी घटने के सरकारी दावों पर पानी फेरते हुए यह समूचा वर्ग बीपीएल में नाम लिखाने पर मजबूर न हो जाए। क्योंकि लंबे लाॅक डाउन में थोड़ी बहुत जमापूंजी खर्च हो चुकी है। उधारी पर किराना मिलना भी मुश्किल है। पढ़े-लिखे, बेटे-बेटी ऑन लाइन अर्जियों के जवाब की आस में थकने लगे हैं। जरूरतों का पहाड़ उठाएं तो कैसे? 
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो ज्यादातर निम्न मध्यम वर्ग आज भाजपा का समर्थक है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का तो परम भक्त है। वह हर मुसीबत का सामना इस भरोसे में कर रहा है कि मोदीजी जो कर रहे हैं तो सब ठीक ही होगा। कैसे होगा, यह उसे नहीं पता। निम्न मध्यम वर्ग की खूबी यही है कि वह बहुत दूर की नहीं सोचता। ‍परिणामो की चिंता में वक्त जाया नहीं  करता। समय के मंदिर में अपना कोई देवता गढ़कर बस वह कुछ न कुछ करता रहता है। पहली बार ऐसा हुआ है कि कोरोना के चलते न वर्तमान ठीक दिख रहा है और न ही भविष्य। किसे दोष दें, यह भी समझ नहीं आ रहा। अंग्रेजी में कहते हैं कि मध्यम वर्ग समाज का पेट है, मानवीय उद्योगों का उपभोक्ता है तथा अच्छे और बुरे बैक्टीरिया का मेजबान है। सचमुच जीवन के खुरदुरे कैनवास पर बैक्टीरिया के इस मेजबान  का सामना पहली बार ऐसे दैत्य वायरस से हुआ है, जो किसी वर्गभेद या वर्गवाद को नहीं मानता। कोरोना तो ठीक, उसकी दहशत भी निम्न मध्यम के वर्ग के छोटे-छोटे सपनों को रौंद रही है और इस रौंदे जाने से उसे कोई ‘देवता’ नहीं बचा पा रहा। आगे बचाएगा, इसकी भी कोई गारंटी नहीं है, क्योंकि जज्बात और हकीकत में गहरी ‍विभाजन रेखा जो खिंच गई है।   

वरिष्ठ संपादक 
‘राइट क्लिक’
( ‘सुबह सवेरे’ में दि. 27 मई 2020 को प्रकाशित)

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