वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक रमण रावल लिखते हैं, सरकार ये क्या गजब कर डाला आपने, पढिय़े एक क्लिक पर

  • May 12,2020 10:25 am

शराब की बिक्री, प्रवास की छूट: सरकार, ये क्या गजब कर डाला आपने?

रमण रावल

यदि देश में कोरोना का संक्रमण अब भी फैलता ही रहा तो मानकर चलिये, उसमें कुछ राज्य सरकारें, आप, कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस जैसे विपक्षी राजनीतिक दल जवाबदार होंगे। केंद्र सरकार भी इससे बरी तो नहीं हो पायेगी, भले ही सीधे तौर पर वह दोषी करार न दी जाये। जो दुनिया इस महामारी को रोकने के त्वरित प्रयासों के लिये भारत की तारीफें कर रही थीं और हम खुद भी निश्चिंतता महसूस कर रहे थे, उन पर दो निहायत बचकाना, गैर जरूरी कदमों ने पानी फेर दिया। पहली, शराब की दुकानें खोलने का निर्णय,जहां दो-दो किलोमीटर तक लोग एक-दूसरे के ऊपर टूटकर शराब खरीदते रहे। दूसरा, पहले दिल्ली से और फिर मुंबई से मजदूरों को उनके राज्यों में जाने देना। पूरी आशंका है कि ये दोनों कदम आत्मघाती साबित हों। ये ऐसी हरकतें हैं, जिनके लिये शायद हम माफी मांगने लायक भी न रहें। अब भी बच सकते हैं तो एक-दो महीने और तालाबंदी के अधीन रहकर। यह बेहद त्रासदायक होगा, लेकिन कोई चारा भी तो नहीं । शर्म,गुस्सा और कोफ्त आ रही है विपक्षी राजनीतिक दलों के उन नेताओं पर जो सरकार के साथ खड़े होने  की बजाय पूरे समय उपदेश दे रहे हैं, मीडिया में बयानबाजी का खेल खेल रहे हैं, सोशल मीडिया को ढाल बनाकर मजदूर-श्रमिक वर्ग को उनके घर जाने की पैरवी कर रहे हैं, उन्हेें प्रकारातंर से भडक़ा रहे हैं।

    कितना सुकून मिलता था, जब इस तरह की सूचनायें हम तक पहुंचती थी कि 130 करोड़ की आबादी में कुछेक हजार ही कोरोना संक्रमित निकले हैं, हजार-बारह सौ मौतें हुई हैं और संक्रमण का यह आंकड़ा अब कम होने जा रहा है। यह आस भी जागी कि एक,डेढ़ माह की तालाबंदी से आजादी मिलने वाली है और हम फिर से आम दिनों की तरह क्रिया कलाप कर सकेंगे । हाय, कितने निपट मूर्ख हैं हम। हमने ऐसा उत्साही निष्कर्ष निकालने में कुछ ज्यादा ही जल्दी कर ली। थोड़ा और रुक जाते तो घनघोर निराशा में घिरने से बच जाते, क्योंकि तब हमें पता होता कि आफत कहर बरसाने वाली है। जिस तरह से दुुनिया ने हमें सराहा था, अब खिल्ली उड़ाने को बेताब होगी। वे अंतत: यह सोचने और कहने में कामयाब हो जायेंगे कि कालों में हमसे ज्यादा अक्ल कहां से आ सकती है? दिल के कालों को रंग के काले ऐसी मात दे सकते थे कि उनका विज्ञान,तकनीक,संसाधन, समझदारी सब धरे रह जाते और गाय,गोबर,लंगोटधारी साधुओं के देशवासी कहलाने वाले अपने संयम, सरकार के ससमय तालाबंदी, कोरोना वायरस के उडक़र आने में हुई देरी जैसे मिले-जुले कारणों से हम जल्दी इससे बाहर आ जाते, इसके अपेक्षाकृत कम प्रभाव का सामना करते और कम तादाद में इससे बीमार होते, मरते। अब यह नहीं हो रहा है, यह जान लेना चाहिये।

    जिस तरह से पहले एक ही दिन में शराब के लिये लोग उमड़़े और तीन राज्यों में करीब 600 करोड़ रुपये की शराब बिक गई, उसने उन राज्यों के खजाने में मामूली सा इजाफा तो कर दिया, किंतु संक्रमण में जितने इजाफे का दंश मार दिया है, वह सामने आने को है, तब जान लीजियेगा। रही सही कसर देश की राजनीतिक और औद्योगिक राजधानी दिल्ली और मुंबई से निकलेे मजदूरों, छुटपुट खोमचा,ठेला, ऑटो रिक्शा चलाने वालों ने पूरी कर दी है।मुंबई में शिव सेना-कांग्रेस की मिली जुली सरकार ने तो हद कर दी।  वहां तो जैसे स्वर्ग हो ऐसे सारी  दुकानें, बाजार , दफ्तर खोल दिए गए हैं।  लोग धड़ल्ले से सड़कों पर निकल रहे हैं। जैसे वह देश का हिस्सा ही नहीं हो ऐसा आचरण किया जा रहा है। 

   देखा जाये तो देश में सब कुछ ठीक चल रहा था, लेकिन जिनकी रगों में केवल राजनीति का लहू बहता है, उनको फितरत का कीड़ा काट रहा था कि जिस कोरोना से दुनिया चीत्कार कर रही है, उससे भारत राहत पाने के जतन कैसे कर सकता है? खासकर तब, जब देश की बागडोर हमारे हाथ में नहीं है । फिर, इन्होंने चिल्लाना शुरू कर दिया कि श्रमिक वर्ग भुखो मर रहा है, उसकी कोई चिंता नहीं कर रहा। सरकार उन्हें घर भेजने के लिये विशेष रेलगाडिय़ां, बसें चलाये । ये टीवी, अखबार, सोशल मीडिया पर दिन-रात चिल्लाते रहे , जब तक कि सरकार ने इस बारे में सोचना और कुछ करना तय नहीं कर लिया। यह वो समय था जब सरकार ने ऐतिहासिक भयंकरतम भूल करने का सोच लिया और विपक्ष अपनी कुटिल रणनीति में कामयाब रहा । 

    इन दिनों कांग्रेस और विपक्षी दलों ने कोरोना से संघर्ष में सरकार के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहने की बजाय  ट्वीटर, फेसबुक, टीवी और अखबारों के माध्यम से मुहिम छेड़ कर प्रवासी मजदूरों को उनके घर भेजने की मांग उठाई। रात -दिन मचे प्रलाप से उकताकर सरकार ने भी धैर्य खो दिया और मजदूरों के लिये रेल,बसें चलाने की अनुमति जारी कर दी। बेशक, इससे पहले छुटपुट तौर पर वे अपने गांवों की ओर पैदल निकल भी पड़े थे, जो कि विपक्ष की बयानबाजी का ही नतीजा था। यदि वे वाकई अपने गांव ही जाना चाहते तो अप्रैल के पहले हफ्ते से ही शुरू कर देते। अब यह कहने-मानने मेें संकोच नहीं कि वे विपक्ष के बहकावे में आकर ही पैदल निकले। दूसरी वजह उन का राशन-पानी खत्म हो जाना भी रहा ही होगा, इसमें दो राय नहीं ।

    यहीं विचारणीय मुद्दा यह है कि जो मजदूर वर्ग अपने मूल घरों को लौटने को उतावला बताया गया, उसके पास गांव में क्या है? जाहिर सी बात है कि वहां भी वह खाली हाथ है और शहर में भी खाली हाथ था। यदि भरे हाथ ही होता तो शहर जाता ही क्यों? तब यह ख्याल कैसे आया कि गांव जाकर उसके राशन-पानी और रोजगार की भी व्यवस्था हो जायेगी? याने वह दुष्प्रचार का शिकार ही हुआ । सरकार से गलती यह हुई कि जब 22 मार्च को जनता कर्फ्यू  लागू किया तब या 25 मार्च से तालाबंदी लागू की तब भी वह प्रवासी मजदूरों के बारे मेें नहीं सोच पाई। हो सकता है, तब सरकार यह अंदाज नहीं लगा पाई कि तालाबंदी कितनी लंबी चलेगी। उस वक्त दो उपाय किये जा सकते थे। एक, तालाबंदी तत्काल न करते हुए 3-4 दिन बाद करना था। साथ मेें घोषणा कर दी जाती कि जिसे जहां जाना हो, चला जाये, ताकि बाद मेें किसी को यह अफसोस न हो कि वह अपनों से दूर है या जहां जाना चाहता था, न जा पाया। दूसरा, जब मजदूरों समेत सभी को जो जहां है, वहां रोक ही दिया गया  तो रोजनदारी वाले तबके के राशन-पानी की व्यवस्था भी करना था। इसके लिये वह संगठित वर्ग के मजदूरों के लिये उनके नियोक्ता से और असंगठित वर्ग के लिये उनकी चिन्हित बस्तियों में जाकर भोजन पैकेट या सूखे राशन की उपलब्धि सुनिश्चित कर सकता था। इसके लिये स्वयंसेवी संगठनों की मदद ली जा सकती थी। यदि ऐसा हो जाता तो भी मजदूरों को घरों की ओर कूच करने के जतन नही करने पड़ते और देश इस अनचाही मुसीबत के पंजों में वैसे नहीं फंसता, जैसी अब आशंका जन्म ले चुकी है।

    अब एक बात विपक्ष की समझ में आ जाना चाहिये कि मजदूरों के गांव लौटने से यदि कोरोना का संक्रमण बढ़ता है, चक्रवृद्धि तरीके से फैलता है तो उसके  जवाबदार वे ही होंगे। इससे यदि मौतों का अंबार लगता है तो इसे नरसंहार माना जाना चाहिये और दोषी विपक्ष को ठहराना चाहिये। यदि ये विपक्षी नेता देश के श्रमिक-मजदूर वर्ग के इतने ही बड़े हितचिंतक थे तो बजाय इसके कि उन्हें घर भेजने के लिये रेल,बस, पास की व्यवस्था की मांग करते, अपने खीसे से उनके राशन-पानी की व्यवस्था करते। जिस तरह से उनके रेलवे भाड़े की पेशकश कर इस समय भी वोट बैंक की  राजनीति की गई, उसके बजाय प्रस्ताव उन के खान-पान का देते। जाते उन मजदूरों-श्रमिकों के बीच और खोल देते भंडारा। देश में एक जगह भी इन लोगों ने पार्टी के झंडे तले लंगर,भंडारा, भोजनशाला चला रखी हो तो कोई बताये। तब तो समझते कि वे राजनीति से ऊपर उठकर पेश आ रहे हैं। आपने 60 साल से अधिक इस देश पर राज किया और अब भी इसे जागीर की तरह समझते हो। अपने कार्यकाल के करोड़ों,अरबों के घोटालों का अभी-भी उजागर होने का सिलसिला जारी है तो कुछ तो शर्म कर लेते कि जिन लोगों को बहकाकर राज करते आये, उनकी मदद करने की जिम्मेदारी ले लेते , तब तो कोई बात होती। काश ऐसा होता तो मेरा देश इस अनजानी मुसीबत की गहरी खाई में गिरने की आशंका में घिरा नहीं होता, बल्कि खाई से बाहर आकर उम्मीद,उमंग,स्वस्थ, प्रसन्नता का संदेश दुनिया को देता और बताता कि कैसे आचरण से, मिले-जुले प्रयासों से,राजनीतिक आग्रह-दुराग्रह से ऊपर उठकर इस पर विजय पाई जा सकती है। धिक्कार है ऐसी ओछी राजनीति पर। मजदूर-श्रमिक वर्ग को भडक़ाने वाले नेता इतना तक भूूल गये कि देश के जो अधिकांश गांव अभी तक कोरोना मुक्त थे, अपने किसी संक्रमित भाई-बंधुओं के आ जाने के बाद पूरे के पूरे गांव चपेट में आ जायेंगे। वहां तो संक्रमण का पता चलने में ही इतनी देर हो जायेगी कि सहायता पहुंचने से पहले ही लोग कीड़ें-मकोड़ों की तरह मरने लग सकते हैं। गांवों में न तो चेतना है,न चिकित्सा संसाधन, न अस्पताल, न जांच उपकरण। बेहद वाहियातपना है यह तो। यदि ऐसा हुआ तो इसे विपक्ष प्रायोजित नरसंहार मानकर उस पर कार्रवाई की जाना चाहिये।

        तो देशवासियों,यदि आप ये ख्वाब संजो रहे हैं कि 17 मई से आप सडक़ों पर दौड़ लगाने वाले हैं तो भूल जाइये। कुछ हर हाल में राजनीतिक रोटियां सेंकने वालों ने, कुछ हमने, कुछ हालात ने और कुछ सरकार ने ऐसी चूक की है कि बेहतरी घर में कैद रहने में ही है। 1 जून से क्रमश: आजादी हासिल हो सकती है, जो परिस्थितियां तय करेंगी। अब तो यही लगता है कि खुद की जान बचाना है तो कामकाज की चिंता को दरकिनार करना होगा। यह किसी भी तरह अच्छा तो नहीं होगा, लेकिन यह विकल्पहीन मसला है। आप पंगा लो, आपके काम लग जायेंगे। साथ में आप इस संताप को अपने परिवार,पड़ोसी, मोहल्ले को दे जायेंगे। इसलिये हमारा सिर्फ और सिर्फ एक ही लक्ष्य होना चाहिये, कोरोना की श्रृंखला को तोडऩा, कड़ी को कड़ी से जुडऩे नहीं देना। इसमें शक्ति से अधिक हिकमत की जरूरत है।

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