लोकसभा चुनाव 2019

यहां भाजपा नहीं संघ की प्रतिष्ठा दाव पर है 

  • Apr 22,2019 17:04 pm

(अरविंद तिवारी)

मालवा-निमाड़ के दो संसदीय क्षेत्रों देवास-शाजापुर और झाबुआ से अपनी पसंद के उम्मीदवारों को मैदान में लाने के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने यहां चुनाव के सारे सूत्र अपने हाथ में ले लिए। इन दोनों क्षेत्रों में भाजपा नहीं संघ की प्रतिष्ठा दाव पर लगी है और यही कारण है कि बूथ स्तर पर संघ का नेटवर्क अभी से सक्रिय हो गया है। 

जज की नौकरी छोड़ देवास-शाजापुर क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे, महेंद्र सोलंकी नौकरी में आने के पहले संघ के  पदाधिकारी रहे थे और संघ की गतिविधियों में भी उनकी अहम भूमिका रहती थी। इस क्षेत्र से जब भाजपा उम्मीदवार की तलाश शुरू हुई थी, तब शुरुआत से ही संघ ने सोलंकी को उम्मीदवार बनाने पर जोर दिया था। उनके नाम पर संघ का दबाव कितना ज्यादा था, इस बात का अंदाज इसी बात से लगाया जा सकता है कि केंद्रीय मंत्री थावरचंद गेहलोत की पसंद होने के बावजूद चंद्रशेखर मालवीय के नाम को अनदेखा किया गया। सोनकच्छ के दो पूर्व विधायकों सुरेंद्र वर्मा और राजेंद्र वर्मा के दावे भी इसी कारण धरे रह गए। सोलंकी अब पूरे दमखम से मैदान में हैं और उनकी चुनावी रणनीति के सारे सूत्र संघ के दिग्गजों ने संभाल रखे हैं। मुकाबले में पद्मश्री प्रहलादसिंह टिपाणिया जैसा अविवादित नाम होने से संघर्ष बहुत कड़ा है, लेकिन संघ की सक्रियता का फायदा फिलहाल तो सोलंकी को मिल रहा है। यह क्षेत्र वैसे भी जनसंघ और भाजपा का परम्परागत क्षेत्र रहा है। 1980 के बाद यहां से केवल दो बार 1984 और 2009 में कांग्रेस को मौका मिल पाया है। 

पिछले साल नवंबर में हुए विधानसभा चुनाव में जब गुमानसिंह डामोर ने झाबुआ विधानसभा क्षेत्र से कांतिलाल भूरिया के बेटे डॉ. विक्रांत भूरिया के खिलाफ भाजपा उम्मीदवार के रूप में मैदान संभाला था, तब उन्हें सबसे ज्यादा मजबूती संघ के अनुषांगिक संगठन सेवा भारती से मिली थी। झाबुआ जिले में सेवा भारती का नेटवर्क बहुत मजबूत है। इसी का फायदा डामोर को मिला और वे डॉ. विक्रांत को शिकस्त देने में सफल हो गए। इस बार भी जब झाबुआ-रतलाम सीट से लोकसभा के लिए भाजपा उम्मीदवार की तलाश शुरू हुई तो निर्मला भूरिया, नागरसिंह चौहान और माधवसिंह डावर के बजाए डामोर को ज्यादा उपयुक्त माना गया। यहां संघ का जो आकलन था उसमें डामोर इन सबसे भारी माने गए थे। यही कारण है कि भाजपा ने विधायक होने के बावजूद उन्हें यहां से लोकसभा चुनाव लडऩे का मौका दिया। डामोर की उम्मीदवारी के साथ ही यहां से संघ सक्रिय हो गया और सेवा भारती के नेटवर्क के माध्यम से गांव-गांव दस्तक शुरू हो गई है। 

सालों पहले जब मध्यप्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी, तब संघ ने झाबुआ में हिंदू संगम करके पांव पसारना शुरू किए थे और इसका नतीजा 2003 के विधानसभा चुनाव में उस वक्त देखने को मिला जब झाबुआ-अलीराजपुर जिले की पांचों विधानसभा सीटों पर कांग्रेस का सूपड़ा साफ हो गया। संघ ने यहां जो मेहनत की थी, उसी का नतीजा था कि 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां कांतिलाल भूरिया जैसे बड़े नेता को लोकसभा चुनाव में शिकस्त खाना पड़ी थी। संघ के मोर्चा संभालने के कारण झाबुआ-रतलाम सीट पर मुकाबला इस बार कड़ा होता दिख रहा है। संघ ही यहां मुख्य भूमिका में है और भाजपा नेताओं की जिम्मेदारी भी संघ की मंशा के मुताबिक तय हो रही है।

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